By : ABP Ganga | Updated : 09 Sep 2020 08:26 PM (IST)

कितना अच्छा लगता है जब सियासत की फिजाओं में गाहे बगाहे रोजगार, रोजी रोटी और देश की युवा रगों के हित की राजनीति के लिए हल्लाबोल होता. वाकई अच्छा लगता है जब नौकरियों की मांग के नाम पर सरकार की नाक में दम कर देने के सवाल मिशन के तौर पर दाग दिए जाते हैं, लेकिन सवालों पर तब शक होना शुरू हो जाता है. जब सवाल फेंकने वालों के दामन भी इस काम को करने में दागदार होते हैं. कौन नहीं जानता की सपा के शासनकाल में नौकरियों में किस तरह का समाजवाद काम कर रहा था और किस तरह 2012 से 2017 तक नौकरी की तलाश में जुटे युवाओं के अरमान धुंआ हो रहे थे. तो हमारा सवाल सीधा सा है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बेरोजगारी पर बुलंद होने की चाहत विपक्ष में रहने के दौरान ही याद आती है और सवाल ये भी है कि जो मुद्दा अखिलेश यादव ने उठाया है क्या इसके बाद एक सकारात्मक तस्वीर सूबे में देखने को मिलेगी. इसकी उम्मीद की जा सकती है। यही उत्तर मांग रहा है आज प्रदेश.



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