नई दिल्ली: चीन अपने नापाक मंसूबों से बाज़ नहीं आ रहा है. कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना रखने वाला चीन एक बार फिर उसी साजिश के तहत खड़ा दिखाई दे रहा है. लद्दाख तो बहाना है, दरअसल कब्जा तवांग पर पाना है. तवांग भारत और चीन के बीच विवाद की अहम वजह है. आज आपको हमारी इस रिपोर्ट में बताएंगे कि आखिर क्यों है तवांग इतना अहम.

जब जब देश का कोई बड़े नेता या विदेशी ब्यूरोक्रेट अरुणाचल प्रदेश का दौरा करता है तो चीन को इससे बड़ी आपत्ति होती है. फिर चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अरुणाचल प्रदेश का दौरा हो या 2016 में उस वक्त के अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा का दौरा हो या फिर खुद दलाई लामा का अरुणाचल का दौरा हो.

चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत बताता है. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर कई बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन आज तक मुद्दा सुलझ नहीं पाया है. दोनों देशों के बीच 3,500 किमोलीटर (2,174 मील) लंबी सीमा है. सीमा विवाद के कारण दोनों देश 1962 में युद्ध के मैदान में भी आमने-सामने खड़े हो चुके हैं, लेकिन अभी भी सीमा पर मौजूद कुछ इलाकों को लेकर विवाद है, जो कभी-कभी तनाव की वजह बनता है.

अंतरराष्ट्रीय मानचित्रों में अरुणाचल को भारत का हिस्सा माना गया है और हमेशा से ही भारत का हिस्सा रहा है. चीन तिब्बत पर कब्जा करने के बाद अरुणाचल प्रदेश को भी अपना बताने लगा. दूसरों की ज़मीन को खुद का बताना चीन के लिए कोई नई बात तो नहीं है. यही कारण है कि चीन अरुणाचल को दक्षिणी तिब्बत कहता है. शुरू में अरुणाचल प्रदेश के उत्तरी हिस्से तवांग को लेकर चीन दावा करता था. यहां भारत का सबसे विशाल बौद्ध मंदिर है.

चीन और भारत के बीच मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा माना जाता है. लेकिन चीन इसे ख़ारिज करता है. चीन का कहना है कि तिब्बत का बड़ा हिस्सा भारत के पास है जबकि हकीकत में तिब्बत कभी चीन का था ही नहीं. कभी एक अलग देश तिब्बत पर चीन ने कब्जा कर लिया था. 1950 के दशक के आख़िर में तिब्बत को अपने में मिलाने के बाद चीन ने अक्साई चीन के क़रीब 38 हज़ार वर्ग किलोमीटर इलाक़ों को अपने अधिकार में कर लिया था. ये इलाक़े लद्दाख से जुड़े थे.

चीन ने यहां नेशनल हाइवे 219 बनाया जो उसके पूर्वी प्रांत शिन्जियांग को जोड़ता है. भारत इसे अवैध क़ब्ज़ा मानता है. चीन ने तिब्बत को कभी स्वतंत्र मुल्क नहीं माना, उसने 1914 के शिमला समझौते में भी ऐसा नहीं माना था. 1950 में चीन ने तिब्बत को पूरी तरह से अपने क़ब्ज़े में ले लिया.

चीन चाहता था कि तवांग उसका हिस्सा रहे जो कि तिब्बती बौद्धों के लिए काफ़ी अहम है. 1962 में चीन और भारत के बीच युद्ध हुआ. अरुणाचल को लेकर भौगोलिक स्थिति पूरी तरह से भारत के पक्ष में है इसलिए चीन 1962 में युद्ध जीतकर भी तवांग से पीछे हट गया. इसके बाद से भारत ने पूरे इलाक़े पर अपना नियंत्रण मज़बूत कर लिया.

चीन लगातार दलाई लामा का विरोध करता रहा है. 84 साल के दलाई लामा साल 2017 में असम की राजधानी गुवाहाटी पहुंचे थे, वहां से तेजपुर, बोंडिला, दिरांग होते हुए तवांग और अरुणाचल के पश्चिमी कमांग के जिले तक गए थे. चीन हमेशा से दलाई लामा को अलगाववादी नेता मानता आया है और कहता है कि वह साल 1959 में असफल सैन्‍य विद्रोह के बाद तिब्‍बत से भागकर भारत आए थे. वह सबसे पहले तवांग ही पहुंचे थे.

दलाई लामा साल 2017 में अरुणाचल के लुमला, तवांग बौद्ध मठ और दिरंग में नग्निगमापा बौद्ध मठ गए थे. दलाई लामा ने अरुणाचल पहुंचने से पहले उस पल को याद किया था कि कैसे उन्‍हें तिब्‍बत छोड़ने को मजबूर होना पड़ा था. दलाई लामा ने बताया था, ‘चीन की सेना की कार्रवाई लगातार बढ़ रही थी. मेरे पास कोई और विकल्‍प नहीं बचा था. 17 मार्च को मैं वहां से निकला.’ उन्‍होंने आगे कहा था कि 58 वर्ष पहले तवांग में उन्‍हें जिस तरह का स्‍वागत मिला था, वह उनके लिए ‘आजादी का पल’ था.

बता दें कि 1959 में चीन की कम्युनिस्ट की सरकार ने सैन्य बल का इस्तेमाल कर समूचे तिब्बती क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने तिब्बती जनता पर अपना शासन थोप दिया था. इसकी वजह से तिब्बत आध्यात्मिक प्रमुख दलाई लामा के पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा कि अपनी मातृभूमि को छोड़ दें और पड़ोसी देश भारत में शरण ले लें. वह 80,000 से ज्यादा तिब्बतियों के साथ पैदल चलकर भारत आ गए और निर्वासन में जाने को मजबूर हुए थे.

भारत की जमीन पर कदम रखने के दलाई लामा ने निर्वासित तिब्बती सरकार की सभी संस्थाओं को फिर से खड़ा करने की कोशिश शुरू की थी. इसके साथ ही उन्होंने नए निर्वासित तिब्बती संसद की स्थापना की प्रक्रिया भी शुरू कर की. उन्हीं के संरक्षण में भारत में निर्वासित तिब्बती सरकार का अस्तित्व बरकरार है. ऐसे में चीन को यह बात बार-बार खटकती रहती है कि भारत ने दलाई लामा को भारत में रहने की इजाजत दी है.

आपको बता दें कि तिब्बती लोगों पर दलाई लामा का बड़ा प्रभाव होता है. यही कारण है कि दलाई लामा को तिब्बती लोगों के बीच सबसे अहम माना जाता है. तिब्बत में लगातार चल रही आजादी की लड़ाई के बीच चीन चाहता था कि दलाई लामा किसी तरह से चीन की तरफ आ जाए जिससे कि वहां के लोगों को शांत किया जा सके. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

तिब्बती बौद्ध धर्म में सर्वप्रथम दलाई लामा को माना जाता है. उनका इनफ्लुएंस भी बौद्ध धर्म के लोगों पर काफी ज्यादा है. इस वक्त दलाई लामा भारत में है. ऐसे में अब चीन इस कोशिश में जुटा है कि बौद्ध धर्म में दूसरे नंबर पर आने वाले पंचेन लामा को आगे किया जाए. चीन ने पारंपरिक रूप से तिब्बती बौद्ध धर्म के दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति पैंचेन लामा की प्रोफाइल बढ़ाने के लिए पिछले कई सालों से कदम उठाए हैं. क्योंकि पंचम लामा अगले दलाई लामा को चुनने में अहम भूमिका निभाते हैं. तिब्बतियों के दिल को जीतने के लिए चीन पंचेन लामा को तैयार कर रहा है.

पंचेम लामा को 1995 में बीजिंग ने चुना था. यही कारण है कि पंचेन लामा का झुकाव चीन की तरफ रहा है. वहीं दलाई लामा को चीन एक अलगाववादी के तौर पर देखता है. जो कि 1959 को भारत चले गए थे. पिछले कई सालों से चीन पंचेन लामा को आगे कर लोगों के बीच लाता रहा है. यह सोचते हुए कि किसी तरह से पंचेम लामा तिब्बतियों का भरोसा जीतने में कामयाब होंगे, साथ ही अंतरराष्ट्रीय सम्मान दलाई लामा की तरह ही पा सकेंगे.

यही कारण है कि वक्त वक्त पर चीन पंचेन लामा को जिम्मेदारियां देता रहा है. उन्हें 10 वें पंचेन लामा का पुनर्जन्म माना जाता है, जो खुद चीन में ही रह कर जेल में रहे जबकि दलाई लामा छोड़कर भारत चले गए थे. हालांकि बहुत धर्म के लोग चीन द्वारा खड़किए गए पंचेन लामा को नहीं मानते. उनका कहना है की पंचेम लामा 10 साल के थे तब से लापता है. ऐसे में चीन सिर्फ की तिब्बतियों को लुभाने के लिए नए पंचम लामा के जरिए अपनी साजिश रच रहा है.

दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश के दौरे को लेकर चीन पूरी तरह से भड़क गया था और यहां तक कि भारत को धमकी देनी भी शुरू कर दी थी. आज भी चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा और जासूसों के जरिए दलाई लामा पर नजर रखे हुए हैं. यहां तक कि दलाई लामा पर हमला करने की साजिश भी चीन करता रहा है. ऐसे में यह बात तो साफ है कि अगले दलाई लामा को खुद दलाई लामा ही चुन सकते हैं जो कि इस वक्त भारत में मौजूद है. साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि अगले दलाई लामा तवांग से हो सकते हैं. दूसरी ओर चीन इस कोशिश में रहा है कि वह अपना दलाई लामा नियुक्त करें जो कि फिलहाल बिल्कुल भी संभव नहीं दिख रहा. ऐसे में भारत के तवांग से दलाई लामा का होने का अर्थ है कि तिब्बत के लोग भारत की तरफ होंगे और चीन के खिलाफ उनके आजादी के सुर यूं ही बढ़ते रहेंगे. ऐसे में चीन की कोशिश यही है कि तवांग पर कब्जा किया जाए लेकिन हर बार चीन को मुंह की खानी पड़ी है.

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