नई दिल्ली: भारत पड़ोसियों की जमीन इस्तेमाल कर घेराबंदी बनाने की पाकिस्तान-चीन की नापाक सांठगांठ से मुकाबले के लिए भारत भी जवाबी रणनीतिक पर तेजी से मजबूत कर रहा है. वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चल रहे तनाव के बीच बीते एक माह में वियतनाम, रूस, ताजिकिस्तान, कजाखिस्तान, उजबेकिस्तान, ईरान जैसे चीन-पाकिस्तान के पड़ोसियों के साथ भारत की अहम रणनीतिक वार्ताएं इसी भारतीय पेशबंदी की कड़ी हैं.

चीन से जारी सीमा तनाव के दौरान बीते तीन महीने में जहां भारतीय रक्षा मंत्री दो बार रूस के दौरे पर थे. यह भारत की अहम कामयाबी थी कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके रूसी समकक्ष सर्गेई शोइगु के बीच हुई बातचीत में भारत को भरोसा हासिल हुआ कि रूस जहां पाकिस्तान को अपने उन्नत हथियारों की आपूर्ति नहीं करेगा वहीं सुरक्षा हितों के मामले पर भारत के साथ खड़ा होगा.

मॉस्को में दो दिन पहले अगर भारतीय रक्षा मंत्री ने अगर चीनी रक्षा मंत्री से अगर सीमा मामले पर खुली औऱ खरी बात की तो वहीं ताजिकिस्तान, कजाखिस्तान जैसे उन महत्वपूर्ण मध्य-एशियाई देशों के रक्षामंत्रियो के साथ भी बात की जिनकी सरहदें चीन से सटती हैं. ताजिकिस्तान न केवल चीन का पड़ोसी मुल्क हैं बल्कि भारत का एक रणनीतिक साझेदार भी है. ताजिकिस्तान का अयनी सैन्य बेस एक मात्र वो ठिकाना है जहां देश से भारतीय वायुसेना तैनात है.

भारत की अफगानिस्तान रणनीति के लिहाज से भी ताजिकिस्तान महत्वपूर्ण है जहां भारतीय और रूसी सैन्य अधिकारी ताजिक सेना की मदद के लिए तैनात रहते हैं. भारतीय सैन्य मौजूदगी इस इलाके में 2002 से बनी हुई है वहीं दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को अधिक मजबूत किया जा रहा है.

ताजिकिस्तान की रणनीतिक अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोवा को सरकार के विशेष दूत के तौर पर जनवरी 2020 में दुशान्बे गए थे. भारत के रणनीतिक पैंतरों से परेशान चीन ने 2018 के बाद ताजिकिस्तान-पाकिस्तान और चीनी सीमा के करीब वाखान गलियारे की सुरक्षा के नाम पर अपने सैनिकों को तैनात करने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया है.

भारत की कोशिश कजाखिस्तान औऱ उजबेकिस्तान के साथ भी अपने रक्षा सहयोग को गहरा करने की है. इसके लिए ही भारत ने जहां कजाखिस्तान के साथ 2015 में रक्षा सहयोग और सैन्य साझेदारी का समझौता किया था. वहीं बीते दो सालों में उजबेकिस्तान के साथ भी भारत ने अपने रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाया है. भारत और उजबेकिस्तान के बीच जहां 2019 में पहली बार रक्षा सहयोग पर संयुक्त कार्य समूह की बैठक हुई थी. वहीं दोनों मुल्कों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास भी नवंबर 2019 में हुआ.

रणनीतक लिहाज से अहम मॉस्को यात्रा के दौरान भारतीय रक्षा मंत्री की वार्ता ईरान के रक्षा मंत्री आमिर हात्मी के साथ भी मुलाकात की. सूत्रों के मुताबिक ईरान के साथ भारतीय रक्षा मंत्री की वार्त अफगानिस्तान की रणनीतिक बिसात के लिहाज से भी खासी अहम थी. जहां भारत की कई अहम सहयोग परियोजनाएं चल रही हैं. ईरान के चाबहार बंदरगाह से जाहेदान के रास्ते अफगानिस्तान के डेराराम-जारांश को जोड़ता रास्ता भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक रास्ता बनाता है. हालांकि इस रास्ते का एक बड़ा हिस्सा  फिलहाल तालिबानी नियंत्रण वाले इलाके में हैं. माना जा रहा है कि भारतीय रक्षा मंत्री की इस यात्रा के दौरान भारतीय खेमे की कोशिश ईरान को यह आश्वासन देने की थी कि अमेरिकी पाबंदियों के बावजूद भारत की चाबहार परियोजनाएं जारी रहेंगी. गौरतलब है कि बीते दिनों चीन ने ईरान के साथ अरबों डॉलर का सैन्य और व्यापार सहयोग समझौता किया.

इतना ही नहीं भारत और वियतनाम के विदेश मंत्रियों के भी संयुक्त समूह वार्ता हुई. दक्षिण चीन सागर में चीनी दादागिरी से चिंतित वियतनाम ने भारत की तरफ से 500 मिलियन डॉलर के आर्थिक सहयोग का इस्तेमाल भारतीय हथियारों की खरीद के लिए करने पर सकारात्मक रुख अपनाने का भरोसा दिया है. ध्यान रहे कि भारत वियतनाम में अपने रक्षा उद्योग के लिए बाजार की तरह देख रहा है. दोनों देशों के बीच भारत से मिसाइल खरीद पर भी बात हुई है.

गौरतलब है कि चीन बीते कई सालों से भारत के इर्दगिर्द अपनी सैन्य और रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने में लगा है. स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की इस रणनीति के तहत ही बीच पाक अधिकृत कश्मीर, पाक के ग्वादर बंदरगाह से लेकर श्रीलंका के हम्मन टोटा बंदरगाह, बांग्लादेश के चिटगांव, म्यांमार में सित्वे बंदरगाह जैसे ठिकानों पर अपनी सैनिक मौजूदगी बढ़ाने की जुगत करता रहा है.

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